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भू-ज्योतिष Acharya Rajjan Prasad Patel

भू-ज्योतिष

Acharya Rajjan Prasad Patel

Published April 5th 2015
ISBN :
ebook
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 About the Book 

WHY BHOO-JYOTISH भू-जयोतिष की आवशकता कयों ?पराचीन व आधुनिक जयोतिष शासतर में महतवपूरण परशन यह है कि पृथवी भी एक गरह है ,जिस गरह पर मनुषय व सभी जीवों का जीवन परारमभ होता है ,जीवन संचालन के लिए समसत आवशकताएं जैसे-शवांस,जल, भोजन,निवास,व अनय आवशयक चींजेंMoreWHY BHOO-JYOTISH भू-ज्योतिष की आवश्कता क्यों ?प्राचीन व आधुनिक ज्योतिष शास्त्र में महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि पृथ्वी भी एक ग्रह है ,जिस ग्रह पर मनुष्य व सभी जीवों का जीवन प्रारम्भ होता है ,जीवन संचालन के लिए समस्त आवश्कताएं जैसे-श्वांस,जल, भोजन,निवास,व अन्य आवश्यक चींजें पृथ्वी ग्रह से ही प्राप्त होती हैं, अतः पृथ्वी ग्रह का प्रभाव , पृथ्वी के सभी जींवों पर कुछ न कुछ अवश्य होना चाहिए ? क्योंकि जब कई प्रकाश वर्ष दूर स्थित नक्षत्रों,राशियों व लाखों करोड़ों किलोमीटर दूर स्थित नवग्रहों का शुभ या अशुभ प्रभाव पृथ्वी पर स्थित जींवों पर हो सकता है ,तब पृथ्वी ग्रह का प्रभाव ,पृथ्वीवासियों क्यों नहीं होगा बल्कि पृथ्वी ग्रह का प्रभाव ,पृथ्वी पर जन्म लेने व निवास करने वाले जीवों पर सबसे अधिक होना ही चाहिए |ज्योतिष शास्त्र की उत्पत्ति वेदों से मानी जाती है इसलिये भारतीय ज्योतिष को वैदिक ज्योतिष कहा जाता है ,अतः हमारा कर्तव्य बनता है की एक बार पुनः वेदों का अध्ययन करें एवम ज्योतिष शास्त्र को विश्व हित , जीव कल्याण के लिए एवम अधिकतम उपयोगी बनाने का प्रयास करें ,तभी हमारें प्राचीन ऋषियों की भावना व सोच ‘ सत्यम शिवम् सुन्दरम” सावित होगी |वेदों में ज्योतिष का वर्णनवेद शब्द संस्कृत भाषा के विद धातु शब्द से बना है विद का आशय विदित अर्थात जाना हुआ ,विद्या अर्थात ज्ञान विद्वान अर्थात ज्ञानी | वेद भारतीय संस्कृति में सनातन धर्म के मूल अर्थात प्राचीनतम और आधारभूत धर्म ग्रन्थ है, जिन्हें ईश्वर की वाणी समझा जाता है | वेद ज्ञान के भंडार है एवं वेदों से अन्य शास्त्रों, पुराणों की उत्पत्ति मानी जाती हैं | वेदों को अपौरूषेय अर्थात बिना पुरुष के , ईश्वर कृत मन जाता हैं, इन्हें श्रुति भी कहते है | हिन्दुओ में अन्य ग्रन्थ स्मृति भी कहलाते है अर्थात मानव बुद्धि या श्रुति पर आधारत ज्ञान | ज्योतिष संबंधी ज्ञान वेदों में हैं ,जिसमे ऋगवेद में करीब 30 श्लोक ,यागुर्वेद में करीब 45 श्लोक एवं अथर्वेद में करीब 165 श्लोक एवं प्राचीन वास्तु ग्रन्थ ‘स्थापत्यवेद’ की अथर्वेद से लिया गया है जिसमे वास्तु से सम्बंधित ज्ञान संकलित है | सबसे महत्वपूर्ण बात जो की वेदों में ज्योतिष सम्बन्धी श्लोक वर्णित है उनका सम्बन्ध भविष्य से नहीं है अर्थात फलित ज्योतिष सम्बन्धी विवरण वेदों में नहीं है लेकिन नक्षत्रों ,ग्रहों व राशिंयों सम्बन्धी प्रार्थनाएं वर्णित हैं | क्योंकि वेद कहते है कि आपके विचार ,आपकी उर्जा,आपकी योग्यता ,आपके कर्म ,आपकी प्रार्थना से ही शुभ वर्तमान व शुभ भविष्य का निर्माण होता है इस प्रकार वैदिक ऋषि उस परम शक्ति परम ब्रह्म अर्थात ईश्वर ,परमात्मा ,खुदा परमेश्वर के साथ साथ प्रकृति के पञ्च तत्वों व अन्य कारकों की प्रार्थना को महत्व देते हैं|सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारें प्राचीन वेदों में ज्योतिष विषय से सम्बंधित बहुत श्लोक वर्णित है लेकिन माँ पृथ्वी से सम्बन्धित श्लोक नवग्रहों,राशियों,एवम नक्षत्रों की अपेक्षा अधिक हैं इससे सिद्ध होता है की वेदों के अनुसार माँ पृथ्वी का महत्त्व सत्ताइश नक्षत्रों,बारह राशियों व नवग्रहों से अधिक है |यथा शिखा मयुरानाम,नागानां मणयो यथा |तद वेदांग शास्त्रांनाम ,ज्योतिषं मूर्धनि स्थितम |जिस प्रकार मयूर के ऊपर शिखा का स्थान ,नागों में मणि का स्थान महत्वपूर्ण है, उसी प्रकार वेंदो व शास्त्रों में ज्योतिष का उच्च स्थान है ,ठीक उसी प्रकार फलित ज्योतिष में नवग्रहों ,बारह राशिओं,व सत्ताइस नक्षत्रों में पृथ्वी ग्रह सबसें महत्वपूर्ण है |बल्लित्था पर्वतानां खिद्रं बिभर्षि पृथिवी| प्र या भूमिं प्रवत्वति महा जिनोषी महिनी|हे प्रकृष्ट गुणवती और महिमावती पृथ्वी देवी! आप भूमिचर प्राणियों को अपनी सामर्थ्य से पुष्ट करती हैं और साथ ही अत्यंत विस्तृत समूहों को भी धारण करती हैं |इस प्रकार भू-ज्योतिष सिद्धांत का उदेश्य ,मानव व अन्य जीवो पर ,पृथ्वी के सापेक्ष ,नवग्रहों,बारह राशियों व सत्ताईश नक्षत्रों का शुभ या अशुभ प्रभाव का सूक्ष्मातिसूक्ष्म अध्ययन करना ,जन्मकुंडली व फलित ज्योतिष में पृथ्वी जैसे मुख्य ग्रह को महत्व प्रदान करना है ,जो की अति आवश्यक है |